रिहायशी क्षेत्र के बीच से चल रहे मालवाहक

विद्यार्थियों से लेकर आम लोग हैं परेशान
कोरबा। कोरबा में सडक़ विकास को लेकर करोड़ों रुपए की राशि खर्च होने के बावजूद कुछ इलाके ऐसे भी है जहां घनी आबादी के बीच से माल वाहकों का संचालन हो रहा है। अमरैयापारा इलाके से कोयला वाहनों कब का मंदिर आम लोगों के लिए सर दर्द बन गया है। लोगों का सवाल है कि आखिर सिस्टम से जुड़े अधिकारी इन चीजों को ठीक क्यों नहीं कर रहे हैं।
रामनगर अमरैया क्षेत्र से होकर भारी वाहनों का परिचालन लंबे समय के बाद फिर से शुरू कर दिया गया। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस रास्ते के दोनों तरफ घनी आबादी बसी हुई है और 24 घंटे इस पर आवागमन होता है। मुख्य मार्ग के एक हिस्से को कनेक्ट करने वाला रास्ता रेलवे क्रॉसिंग की समस्या से पहले ही जूझ रहा है। जहां हर एक-दो घंटे के बाद जाम की परेशानी उत्पन्न होती है और इसके चक्कर में हर कोई दुश्वारियां का सामना करता है। इस मामले को लेकर केवल नाराजगी प्रकट होती रही है लेकिन समाधान कुछ हो नहीं सका। सुबह से रात तक इस मार्ग पर भारी वाहनों के परिचालन के कारण व्यवस्था बिगड़ रही हैं और दुर्घटना की आशंकाएं भी बनी हुई है। इतना ही नहीं कई जिंदगियां भारी गाडिय़ों की चपेट में आकर निपट भी चुकी है। इतना सब कुछ जानने के बाद भी व्यवस्था को बदलने पर ध्यान देना जरूरी नहीं समझ गया। इस इलाके के लोगों का सवाल है कि क्या जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह हमारे क्षेत्र को समस्याओं से मुक्त करने के बारे में विचार करें।
जरूरी कामकाज पर असर
इस क्षेत्र के नागरिक दीपक सिंह राजपूत ने कहा कि आए दिन गाडिय़ों के चक्कर में जाम लग जाता है। ऐसी स्थिति में बच्चों को स्कूल पहुंचने से लेकर यात्री ट्रेन पकडऩे के लिए स्टेशन का सफर भी मुश्किल हो जाता है। परेशानी तब भी खड़ी होती है जब किसी व्यक्ति की तबीयत खराब हो जाए और उसे इस रास्ते से होकर अस्पताल ले जाया जाए। तमाम दिक्कतों की वजह से अक्सर बवाल भी होता है और फिर गाड़ी चालकों को जनता की खाड़ी खोटी सुननी पड़ती है।
चेतावनी का नहीं हुआ प्रभाव
इस पूरे प्रकरण में सबसे खास बात यह है कि कुछ महीने पहले ही भारी वाहन मालिक संगठन की ओर से जिला प्रशासन को ज्ञापन दिया गया था। उसकी ओर से मांग की गई थी कि हमारे गाडिय़ों को चलाने के लिए दूसरा रास्ता दिया जाए। उन्होंने तर्क दिया था कि घनी आबादी वाले इलाके से होकर गाडिय़ों को चलाने में समस्याएं हो रही हैं। ऐसी स्थिति में अगर हादसा होता है तो इसके लिए ना तो वहां मलिक जिम्मेदार होगा और ना ही चालक। इसके बाद भी इस क्षेत्र में दुर्घटना हुई। इस पर भी प्रशासन की ओर से किसी प्रकार की कार्रवाई करना जरूरी नहीं समझ गया। इसे समझ में आता है कि अधिकारियों का रवैया व्यापक जनहित से जुड़े प्रकरणों में किस कदर नकारात्मक बना हुआ है।

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