युद्ध से प्रभावित अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की तैयारी, आर्थिक पैकेज ला सकती है सरकार

नईदिल्ली, १५ मार्च ।
ईरान युद्ध की वजह से प्रभावित हो रही अर्थव्यवस्था की विकास गति को कायम रखने के लिए सरकार आर्थिक पैकेज ला सकती है। विभिन्न मंत्रालयों में इसे लेकर मंत्रणा शुरू हो गई है। ताकि सरकार एक ऐसा पैकेज तैयार कर सके जो देश की आर्थिक विकास दर को पहले की तरह सात प्रतिशत से अधिक के स्तर पर कायम रख सके। निर्यातकों के लिए तो अगले एक सप्ताह में ही वित्तीय राहत की घोषणा हो सकती है। युद्ध की वजह से निर्माण लागत बढऩे से छोटे-छोटे उद्यमियों के उत्पादन प्रभावित होने के साथ उनके भुगतान फंसने की आशंका पैदा हो गई है। इससे उनकी कार्यशील पूंजी फंस सकती है। छोटे उद्यमियों के लिए भी सरकार वित्तीय मदद को लेकर विचार कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी शनिवार को पश्चिम बंगाल में आयोजित रैली के संबोधन में कहा कि युद्ध की वजह से होने वाले असर को हम कम से कम करने का प्रयास करेंगे। गत शुक्रवार को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने युद्ध के मद्देनजर एक लाख करोड़ के आर्थिक स्थिरता फंड का ऐलान संसद में किया। सूत्रों का कहना है कि वह लंबी अवधि की रणनीति है। जबकि पैकेज के जरिए तत्काल प्रभाव से राहत की कोशिश हो सकती है। अभी कई अलग-अलग पैकेज की घोषणा हो सकती है। आर्थिक जानकार कह रहे हैं कि इस समय की कोरोना काल से तुलना करना ठीक नहीं है, परंतु सप्लाई चेन बाधित होने से कच्चे तेल, गैस व एल्युमीनियम, तांबा, टिन जिंक, निकेल जैसे धातुओं की कीमतों में फरवरी के बाद मार्च में तेज उछाल होने से कई उपभोक्ता वस्तुओं का महंगा होना तय है। इन धातुओं की कीमतों में सिर्फ फरवरी महीने में पिछले साल फरवरी की तुलना में 12 प्रतिशत से लेकर 53 प्रतिशत तक का इजाफा हुआ है। ऐसे में उपभोक्ता वस्तुओ की बिक्री प्रभावित होगी।
आर्थिक जानकारों का कहना है कि सरकार की कोशिश होगी कि मैन्यूफैक्चरिंग को जारी रखा जाए और लोगों की नौकरियां पर असर नहीं हो। तभी विकास गति कायम रह सकती है। क्योंकि निर्यातक ही नहीं मंत्रालय सूत्र भी कह रहे हैं कि मार्च में तो निर्यात बुरी तरह प्रभावित होता दिख रहा है। पूरे वित्त वर्ष में मार्च में ही सबसे अधिक निर्यात किया जाता है।औद्योगिक संगठनों का भी मानना है कि चालू वित्त वर्ष 2025-26 की आखिरी तिमाही तो प्रभावित हो चुकी है, लेकिन युद्ध लंबा चलने पर अप्रैल से शुरू होने वाले नए वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही पर भी असर पड़ेगा। औद्योगिक संगठनों के पदाधिकारी कह रहे हैं कि यह असर कितना गहरा होगा, अभी यह आकलन नहीं किया जा सकता है, लेकिन हालात गंभीर है, इसमें कोई शक नहीं है। आगामी महीनों में खुदरा महंगाई दर बढऩे की आशंका गहरा गई है। महंगाई की वजह से वस्तुओं की बिक्री प्रभावित हुई तो सरकार के जीएसटी संग्रह पर भी असर पड़ेगा। कारपोरेट का मुनाफा कम होगा तो सरकार के कॉरपोरेट टैक्स में भी कमी आएगी।

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