हाई कोर्ट का हरियाणा सरकार को बड़ा झटका, 50 वर्ष पुराने भूमि विवाद में सरकार की 27 साल पुरानी अपील खारिज

चंडीगढ़, ११ फरवरी ।
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने करीब 50 साल पुराने भूमि विवाद का निपटारा करते हुए हरियाणा सरकार की 27 वर्ष पुरानी द्वितीय अपील खारिज कर दी और कहा कि राज्य की मनमानी या दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई नागरिकों के वैध रूप से अर्जित भूमि अधिकारों को समाप्त नहीं कर सकती।
जस्टिस वीरेंद्र अग्रवाल ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि प्रशासनिक और अर्ध-न्यायिक प्राधिकरणों को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना अनिवार्य है। विवाद अंबाला जिले के टंगैल गांव की 96 कनाल भूमि से संबंधित था, जिसे राज्य सरकार ने संत राम, दाता राम और आसा राम सहित वादियों को वर्ष 1966 से 1976 तक 10 वर्ष की लीज पर दिया था। लीज की शर्तों के अनुसार लीज अवधि समाप्त होने पर पात्र लाभार्थियों को रियायती दर पर भूमि खरीदने का अधिकार दिया गया था। वादियों ने निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार वर्ष 1976 में 40 रुपये प्रति किल्ला की दर से बिक्री राशि जमा कर भूमि खरीदने का विकल्प प्रयोग किया और संबंधित प्रमाण पत्र भी प्राप्त कर लिया।राज्य सरकार ने बाद में यह दलील दी कि भूमि केवल लीज पर दी गई थी और लीज समाप्त होने के बाद कब्जा अनधिकृत हो गया। साथ ही यह भी कहा गया कि वर्ष 1970 में इस जमीन से संबंधित कार्य पुनर्वास विभाग को हस्तांतरित कर दिए गए थे, इसलिए राजस्व अधिकारियों द्वारा जारी किया गया बिक्री प्रमाणपत्र वैध नहीं था। हाई कोर्ट ने पाया कि वर्ष 1989 में जब इस संबंध में सिविल मुकदमा लंबित था, तब तहसीलदार (सेल्स) ने बिना वादियों को सुनवाई का अवसर दिए ही भूमि हस्तांतरण संबंधी आवेदन खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि दूसरे पक्ष को भी सुनो का सिद्धांत प्राकृतिक न्याय का मूल आधार है और इसका उल्लंघन प्रशासनिक आदेश को अवैध बना देता है। निचली अदालतों ने वादियों के पक्ष में फैसला सुनाया था जिसके बाद राज्य सरकार ने अपील दायर की थी। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि सरकारी रिकार्ड में वर्ष 1975 के बयान से स्पष्ट था कि संबंधित भूमि पर नियमित खेती हो रही थी, फिर भी अधिकारियों ने उपलब्ध रिकार्ड की अनदेखी करते हुए विपरीत निष्कर्ष निकाला। न्यायालय ने इसे स्पष्ट रूप से मनमाना और रिकार्ड के विपरीत आचरण बताया।
फैसले में कहा गया कि कानून के शासन के तहत प्रशासनिक शक्तियां सीमित हैं और राज्य प्राधिकरणों को न्यायसंगत तथा पारदर्शी तरीके से ही निर्णय लेने होते हैं। अदालत ने अंतत: राज्य की अपील खारिज करते हुए निचली अदालतों के निर्णयों को बरकरार रखा और स्पष्ट किया कि वैध रूप से प्राप्त भूमि अधिकारों को प्रशासनिक मनमानी के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता।

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