
जांजगीर चांपा। जब यज्ञ का अनुष्ठान करने का संकल्प करोगे तो सबसे पहले देवता ही विघ्न करते हैं और जब आप दृढ़ता पूर्वक आगे बढ़ोगे तो वही देवता सहायता भी करते हैं इसलिए अपने नियमों पर दृढ़ता पूर्वक डटे रहना! यह बातें श्रीधाम अयोध्या पुरी उत्तर प्रदेश से पधारे हुए अनंत श्री विभूषित श्री स्वामी मधुसूदनाचार्य वेदांताचार्य जी महाराज ने व्यास पीठ की आसंदी से अभिव्यक्त की, वे श्री शिवरीनारायण मठ महोत्सव में श्रोताओं को श्रीमद् भागवत महापुराण की कथा सुना रहे थे। उन्होंने कहा कि तुम्हारा शरीर कितना भी सुंदर हो! कितना सुडौल हो! याद रखना इसकी केवल तीन गति है, या तो यह सड़ कर कीड़ा बन जाएगा, किसी पशु ने खा लिया तो विष्ठा बन जाएगा और नहीं तो दाह संस्कार के बाद राख बन जाएगा। मनुष्य का शरीर बार-बार नहीं मिलता इसे प्राप्त कर व्यर्थ मत खोना, निरंतर हरि का चिंतन करना उनका स्मरण करना और अपने जीवन का मार्ग सुधार लेना तब तुम्हारा मनुष्य तन प्राप्त करना सार्थक हो जाएगा। भगवान के भजन करने के लिए घर छोडऩे की आवश्यकता नहीं है। वन में जाने की आवश्यकता नहीं है। यदि घर छोडक़र जाओगे तो जंगल में कुटिया बनाओगे, तुम्हारा पेट तुम्हारे साथ जाएगा, भूख वहां भी लगेगी। तुम्हारे सारे दुख दर्द भी साथ जाएंगे फिर वही करोगे जो यहां करते हो इसलिए अपने गृहस्थ जीवन में ही भगवान की साधना करना, गृहस्थ के लिए उसका घर ही तपोवन है। और हां जब भगवान का निरंतर चिंतन करोगे तो अपने स्वरूप का ज्ञान हो जाएगा जीव ईश्वर से बिछड़ा हुआ है। यह साक्षात ईश्वर ही है श्री रामचरितमानस में लिखा है कि ईश्वर अंश जीव अविनाशी।। समुद्र का एक बूंद जल भी खारा होता है और पूरा समुद्र भी खारा ही होता है। भगवान एक बार अपने भक्त का हाथ पकड़ लेते हैं तो संसार में कोई भी उसका बाल बांका नहीं कर सकता! जिसका रक्षक भगवान है उसका भक्षक इस संसार में कोई नहीं हो सकता! मंच पर मुख्य यजमान के रूप में हमेशा की तरह महामंडलेश्वर राजेश्री महन्त रामसुन्दर दास विराजित थे।छत्तीसगढ़ शासन के सचिव और कलेक्टर हुए सम्मिलित।


















