
जांजगीर-चांपा। ब्रज गोपिका सेवा मिशन द्वारा आयोजित 21 दिवसीय प्रवचन श्रृंखला के 18वें दिन पूज्य स्वामी युगल शरण ने भक्ति तत्त्व पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि शाखों में वर्णित अन्यभिलाषिताशून्य के आधार पर भक्त दो प्रकार के होते है सकाम और निष्काम। स्वामी जी ने बताया कि सकाम भक्त भी तीन श्रेणियों में आते हैं। पहली श्रेणी वे हैं, जिन्हें भगवान की प्राप्ति हो चुकी होती है, फिर भी यदि वे संसार की कामना करें तो भगवान उसे भी प्रदान कर देते हैं। दूसरी श्रेणी में वे भक्त आते हैं, जिन्हें भगवान अपनी इच्छा से कुछ सांसारिक सुख प्रदान करते हैं। तीसरी और श्रेष्ठ श्रेणी के सकाम भक्त वे होते हैं, जो संसार नहीं बल्कि श्रीकृष्ण को ही अपने
जीवन के संबंधों-पुत्र, पति या पिता-के रूप में चाहते हैं। ऐसे भक्तों की कामना भी श्रीकृष्ण से जुड़ी होती है, इसलिए वे सकाम होते हुए भी उत्तम माने जाते हैं। निष्काम भक्ति की महिमा बताते हुए स्वामी जी ने कहा कि भगवान स्वयं कहते हैं जो निष्काम भाव से मेरी भक्ति करता है, मैं उसके हाथों बिक जाता हूँ। निष्काम प्रेम का अर्थ है अपनी इच्छा को भगवान की इच्छा में समर्पित कर देना। सेवा वही है, जिसमें सेवक की खुशी स्वामी की खुशी में निहित हो। उन्होंने कहा कि कर्म और ज्ञान को भक्ति की आवश्यकता होती है, परंतु भक्ति किसी पर आश्रित नहीं होती। भक्ति करने से ज्ञान और वैराग्य स्वत: प्रकट हो जाते हैं। साधक के लिए साधन भक्ति आवश्यक है, जिसके छह गुण बताए गए हैं-क्लेशों का नाश, शुभ फल प्रदान करना, मोक्ष को भी तुच्छ बना देना, दुर्लभता, सघन आनंद स्वरूप और श्रीकृष्ण को आकर्षित करने की क्षमता। प्रवचन में साधना अवस्था की दो विधियों- बैर्धी भक्ति और रागानुगा भक्ति- का भी उल्लेख किया गया। प्रवचन को सुनने बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और भक्ति तत्त्व की इस गूढ़ व्याख्या से स्वयं को भावविभोर अनुभव किया।
















