
जांजगीर चांपा। ब्रज गोपिका सेवा मिशन द्वारा आयोजित 21 दिवसीय विलक्षण दार्शनिक प्रवचन श्रृंखला में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु उत्साहपूर्वक भाग ले रहे हैं। 7 दिसंबर से प्रतिदिन प्रात: 7 बजे से 8.30 बजे तक मेडिटेशन, रूपध्यान साधना, सुमधुर भजन और कीर्तन का आयोजन भी किया जा रहा है।
प्रवचन श्रृंखला के 9वें दिन युगल शरण ने महापुरुष और गुरु-तत्त्व विषय पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रत्येक जीव आनंद की खोज में निरंतर प्रयासरत है, परंतु वास्तविक आनंद इसलिए प्राप्त नहीं कर पाया क्योंकि जीव ने अनधिकार चेष्टा की, भगवान को स्वयं जानने का प्रयास किया, किसी संत को संत नहीं माना। उन्होंने स्पष्ट किया कि भगवान का नियम है कि वे जीव से प्रत्यक्ष रूप से नहीं मिलते। उनकी प्राप्ति के लिए माध्यम आवश्यक है और यह माध्यम है महापुरुष, गुरु। उन्होंने बताया कि महापुरुष को जानने के लिए तीन प्रकार का ज्ञान आवश्यक है- माहात्म्य ज्ञान, संबंध ज्ञान और सेवा
ज्ञान और यह ज्ञान वही गुरु दे सकता है जिसने स्वयं भगवान को जान लिया हो। वेदों, पुराणों और रामायण का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि गुरु-तत्त्व को ही सर्वाधिक महत्व दिया गया है। वेद मंत्र आचार्यवान पुरुषो हि वेद का उद्धरण देते हुए स्वामी युगल शरण ने कहा कि भगवान की प्राप्ति गुरु की शरण में गए बिना सम्भव नहीं। गुरु के पास जाने की विधि पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि जिज्ञासु को निश्चयात्मक बुद्धि लेकर ही गुरु के पास जाना चाहिए, शंका भाव लेकर नहीं। गुरु वही होना चाहिए जो श्रोत्रिय भी हो और ब्रह्मनिष्ठ भी, अर्थात सैद्धांतिक और व्यवहारिक, दोनों रूपों में पूर्ण। गुरु ही साधना का पथ बताते हैं, कुसंस्कारों से लड़ते हैं, साधक की रक्षा करते हैं और अन्त:करण को शुद्ध कर अंतत: दिव्य प्रेम एवं दृष्टि प्रदान करते हैं। उन्होंने कहा कि भगवंत प्राप्ति के बाद जीव आठ दिव्य गुणों से संपन्न होकर महापुरुष बन जाता है, जैसा कि ग्रंथों में वर्णित है। उन्होंने कहा कि जिसने भगवान को जान लिया वह स्वयं भगवानतुल्य हो जाता है। युगल शरण ने बताया कि श्रद्धा न होने पर भी साधु-संग अवश्य करना चाहिए। कपिल मुनि के उपदेश के अनुसार श्रद्धा की प्रतीक्षा करने से जीवन बीत जाएगा, इसलिए गुरु-संग में जबरदस्ती भी जाना पड़े तो जाना चाहिए। अंत में उन्होंने कहा कि गुरु बाहर से कठोर दिखाई दे सकते हैं, पर भीतर से अपने शरणागत को सदैव संभालते हैं। बाहरी कठोरता साधक को दृढ़ बनाने के लिए होती है, जबकि भीतर का स्नेह उसके आध्यात्मिक उत्थान का आधार बनता है। प्रवचन सुनने बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।




















