
जांजगीर चांपा। ब्रज गोपिका सेवा मिशन द्वारा आयोजित 21 दिवसीय आध्यात्मिक प्रवचन श्रृंखला के 12वें दिन स्वामी युगल शरण ने कर्म मार्ग विषय पर अत्यंत सरल एवं गूढ़ शैली में प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जीवन में कर्म, धर्म और भक्ति का स्वरूप समझे बिना मुक्ति संभव नहीं। सुबह सात बजे आयोजित साधना कक्षा में स्वामी जी ने हरे राम महामंत्र के महात्म्य का वर्णन किया, जिसे सुनकर साधक भावविभोर हो उठे और उनकी आंखों से प्रेमाश्श्रु झरने लगे। स्वामी जी ने कहा कि वेद कर्म के सही स्वरूप की शिक्षा देते हैं सत्यं वद, धर्मं चर, माता-पिता और गुरु की सेवा ही मानव का प्रथम धर्म है। लेकिन आध्यात्मिक वैज्ञानिकों ने अनुभव किया है कि मात्र कर्मकांड से मुक्ति संभव नहीं, इससे केवल स्वर्ग की प्राप्ति होती है, जहाँ पुन: पतन निश्चित है। मुण्डकोपनिषद् के आधार पर उन्होंने कहा कि कर्म से ब्रह्म की प्राप्ति नहीं, भक्ति ही मार्ग है। उन्होंने कर्म के चार रूप-नित्य, नैमित्तिक, काम्य और प्रायश्चित – का विशद वर्णन करते हुए बताया कि कलयुग में शास्त्रसम्मत कर्मकांड करना लगभग असम्भव है। त्रुटि होने पर दंड का भय रहता है। इसलिए कृष्ण ने गीता में अर्जुन को कर्म-धर्म के जंजाल से ऊपर उठकर शरणागति का संदेश दिया। स्वामी जी ने कर्म, विकर्म, अकर्म (कर्मयोग) और कर्मसंन्यास के बीच स्पष्ट भेद बताते हुए कहा कि कर्मयोगी शरीर से कर्म करता है पर मन भगवान में स्थिर रखता है, इसलिए उसे भगवत्प्राप्ति संभव है।
जबकि कर्मसंन्यासी का आचरण साधारण लोग अपनाएंगे तो वे विकर्मी बन सकते हैं, इसलिए लोकसंग्रह हेतु कर्मयोग श्रेष्ठ है। उन्होंने चेताया कि विकर्मी न तो धर्म करता है न भक्ति, इसलिए उसका उद्धार कठिन है। किंतु कर्मी सही मार्गदर्शन पाकर कर्मयोगी बन सकता है। स्वामी जी ने कहा केवल कर्म निंदनीय है, कर्म भक्ति वंदनीय है। अंत में उन्होंने कहा कि दो धर्म हैं- शारीरिक (अपर) और आध्यात्मिक (पर)। मनुष्य को शरीर भरण-पोषण हेतु नहीं, आत्मा के वास्तविक धर्म-भक्ति के लिए मिला है।
























