
सूरजपुर, छत्तीसगढ़। अगर आप समझते हैं कि सरकारी रेस्ट हाउस सिर्फ बोरियत भरी बैठकों और थकान मिटाने के लिए होते हैं, तो सूरजपुर का वन विभाग आपकी यह ‘गलतफहमी’ दूर करने के लिए तैयार है। कुमेली स्थित वन विश्राम गृह में हाल ही में विकास की एक ऐसी ‘अश्लील’ लहर उठी कि मर्यादा ने खिड़की से कूदकर जान देना ही बेहतर समझा।
फाइलों की धूल और घुंघरुओं की गूंज
गरियाबंद की घटना से प्रेरित होकर सूरजपुर वन विभाग ने शायद यह ठान लिया है कि वे मनोरंजन के मामले में पीछे नहीं रहेंगे। कुमेली रेस्ट हाउस में विभागीय फाइलों की जगह ‘ठुमकों’ ने ले ली। वायरल वीडियो में महिलाएं “सैंया जी दिलवा मांगेंगे” जैसे कालजयी गानों पर ऐसा ‘सांस्कृतिक’ प्रदर्शन कर रही हैं कि देखकर मुंशी प्रेमचंद की रूह भी कांप जाए।
जनपद सदस्य का ‘जनसेवा’ मॉडल
चर्चा है कि इस पूरी ‘मधुशाला और नाचशाला’ के मुख्य आयोजक एक माननीय जनपद सदस्य महोदय थे। जनता की सेवा करते-करते थक गए थे, तो सोचा होगा कि सरकारी गेस्ट हाउस में ही थोड़ा ‘रिफ्रेश’ हो लिया जाए। आखिर सरकारी संपत्ति है, तो जनता (यानी उनके खास लोगों) के मनोरंजन के काम ही तो आएगी!
प्रशासन की ‘कुंभकर्णी’ नींद और ‘जांच’ का झुनझुना
जब वीडियो वायरल हुआ और बदनामी की गूँज मंत्रालय तक पहुँची, तब जाकर वन विभाग की टीम ने अपनी आँखें मलीं। अब विभाग ‘जांच-जांच’ का खेल खेल रहा है। सवाल यह है कि जिस सुरक्षित क्षेत्र में परिंदा भी पर नहीं मार सकता, वहां ‘नचनिया’ और ताले माननीय के रसूख को देखकर खुद-ब-खुद खुल गए थे?
प्रदेश के सरकारी भवनों की हालत देखकर लगता है कि अब वहां ‘अति विशिष्ट अतिथि’ की परिभाषा बदल गई है। अब वहां जनहित के फैसले नहीं, बल्कि ‘महफिलों’ के दौर चलते हैं। गजब का नैतिक पतन है, साहब! तालियां बजती रहनी चाहिए।




















