परफेक्ट मुस्कान के पीछे उम्मीदों के बोझ को तलाशती संदीपा धर

ऐसी दुनिया में जहाँ परफेक्शन की सराहना तो होती है, लेकिन उसके पीछे छिपी भावनाओं को शायद ही कोई समझना चाहता है, वहां संदीपा धर दो दीवाने सहर में में नैना के एक बेहद संवेदनशील किरदार के साथ सामने आ रही हैं। नैना एक ऐसी युवती है, जो बाहर से पूरी तरह सुलझी हुई, आत्मविश्वासी और परफेक्ट दिखती है, लेकिन भीतर ही भीतर अपनी पहचान, अकेलेपन और अपेक्षाओं के बोझ से जूझ रही है। विशेष रूप से सलीके से सजी मुस्कान और सहज अंदाज़ के पीछे छिपी एक ऐसी कहानी, जो अपने अस्तित्व के साथ हर हाल में ठीक दिखने की थकान को बयां करती है। अपने किरदार नैना के बारे में बात करते हुए संदीपा कहती हैं, नैना वो लडक़ी है, जिसमें हममें से बहुत से लोग खुद को देख सकते हैं। वो मुस्कुराती है, हर जि़म्मेदारी निभाती है और बाहर से लगता है कि सब कुछ कंट्रोल में है। लेकिन अंदर ही अंदर वो खुद से कटी हुई है, जैसे वो अपनी ही जि़ंदगी में एक किरदार निभा रही हो और असली खुद को भूल चुकी हो। हालांकि आज के समय में ये दबाव बहुत आम बात है, जहां हर हाल में ठीक दिखने की अपेक्षा की जाती है, फिर चाहे आपके अंदर कुछ भी चल रहा हो। फिल्म की भावनात्मक गहराई पर बात करते हुए संदीपा आगे कहती हैं, दो दीवाने सहर में मुझे इसलिए खास लगी क्योंकि यह नजऱअंदाज़ होने की भावना को बेहद खूबसूरती से दिखाती है।

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