
मुंबई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कि संघ किसी सत्ता या शक्ति का भूखा नहीं है, बल्कि समाज के सर्वांगीण विकास और चरित्र निर्माण के लिए समर्पित है। शनिवार को मुंबई में आयोजित ‘100 वर्ष की संघ यात्रा – नए क्षितिज’ व्याख्यान माला के अवसर पर देशवासियों को संबोधित किया। संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में नेहरू सेंटर, वर्ली में आयोजित इस भव्य कार्यक्रम में उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ किसी सत्ता या शक्ति का भूखा नहीं है, बल्कि समाज के सर्वांगीण विकास और चरित्र निर्माण के लिए समर्पित है। डॉ. भागवत ने कहा कि संघ की तुलना दुनिया के किसी अन्य संगठन से नहीं की जा सकती।
उन्होंने एक संस्कृत श्लोक उद्धृत करते हुए कहा कि जैसे आकाश की तुलना केवल आकाश से और समुद्र की समुद्र से की जा सकती है, वैसे ही संघ भी अपनी तरह का अनूठा संगठन है। उन्होंने जोर दिया कि संघ को दूर से या सतही रूप में नहीं समझा जा सकता, इसे जानने के लिए इसका हिस्सा बनना और इसका अनुभव लेना आवश्यक है।
डॉ. भागवत ने संबोधन में स्पष्ट किया कि ‘हिंदू’ शब्द को किसी संकीर्ण दायरे में नहीं देखा जाना चाहिए। यह एक सभ्यतागत पहचान है और इस देश में रहने वाले सभी लोग इसी व्यापक सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि भारत केवल भूमि का टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह हमारी माता है और इसका विकास युवाओं की देशभक्ति पर टिका है।

























