
कोरबा। पौराणिक मान्यताओं के साथ-साथ विभिन्न कथाओं में वर्णित प्रथम पूज्य व विघ्नों के हरण करने वाले भगवान गणपति का उत्सव भाद्र पक्ष चतुर्थी से प्रारंभ हो गया। कई दुर्लभ संयोग इस अवसर पर उपस्थित हुए हैं। इनके बीच एक दंत भगवान की प्रतिमाओं की स्थापना परंपरागत रूप से घरों, संस्थानों और पंडालों में विराजित की जा रही है। सुबह से शुरू हुआ यह सिलसिला आज रात तक जारी रहेगा।
भगवान गणपति के प्राकट्य दिवस को गणेश चतुर्थी का नाम मिला हुआ है। पूरे संसार का चक्कर लगाने की बात जब आई तो उन्होंने अतीत में अपने माता-पिता की तीन परिक्रमा की और इस मान्यता को साबित किया कि परिवार व समाज का सबसे बड़ा प्रमुख आधार यही है। इस धु्रव सत्य को रेखांकित करने के कारण उन्हें श्रृष्टि के प्रथम पूज्य देव में शामिल किया गया। उनके प्राकट्य दिवस से गणेश चतुर्थी का 11 दिवसीय उत्सव मनाने की परंपरा कालांतर में उदित हुई, जो अब भी जारी है। शास्त्रीय मत के अनुसार भाद्रपद चतुर्थी को पूरे समय प्रतिमा स्थापना का मुहूर्त कायम है, क्योंकि इसके साथ किसी दोष की उपस्थिति संभव नहीं है। कोरबा नगर के प्रमुख स्थानों पर बड़ी समितियों ने उत्सव को खास बनाने के लिए वृहद आकार की प्रतिमाएं स्थापित की है। वेद मंत्रों की ध्वनि और भगवान के जयकारे के साथ पुरोहितों ने यहां पर स्थापना की प्रक्रिया पूरी कराई। बताया गया कि यहां पर कई आकर्षण को भी शामिल किया गया है। पूरे उत्सव के दौरान यह कार्यक्रम संपन्न किए जाने हैं। जबकि हजारों की संख्या में सामान्य आकार की प्रतिमाएं शहरी, कस्बाई और ग्रामीण क्षेत्र में लोगों ने अपने घरों पर स्थापित की है। सभी के पीछे एक ही सिद्धांत काम करेगा और वह है हर तरह से जीवन में अनुकूलता व सुख-समृद्धि के साथ विघ्नों से मुक्ति प्राप्त हो।
कटघोरा में विराजे बप्पा
कटघोरा नगर में लगातार दूसरे वर्ष सार्वजनिक पूजा समिति ने माया नगरी मुंबई की तर्ज पर सबसे वृहद आकार की प्रतिमा की स्थापना की है। इसे कटघोरा के राजा का नाम दिया गया है। बताया गया कि इस बार भी भव्य पंडाल में प्रतिमा विराजित की गई। अगले 11 दिन तक कई आयोजन करने की योजना बनाई गई है। पिछले वर्ष अयोध्या के राम मंदिर की तर्ज पर यहां के पंडाल ने लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा था।