नईदिल्ली [एजेंसी]।गंभीर आपराधिक आरोपों में प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री एवं मंत्रियों को लगातार 30 दिनों तक हिरासत में रहने पर उन्हें पद से हटाने का प्रविधान करने वाले विधेयकों ने संसद में तीखा राजनीतिक टकराव खड़ा कर दिया है। विपक्ष ने इन्हें लोकतंत्र विरोधी और संविधान के आत्मा के विरुद्ध बताया है।
इन विधेयकों को विपक्ष ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर संकट करार दिया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने इन्हें संविधान का काला अध्याय बताते हुए कहा कि सरकार ताकत के बल पर जनविरोधी कानून थोपना चाहती है, लेकिन विपक्ष इस मनमानी को बर्दाश्त नहीं करेगा। प्रियंका गांधी वाड्रा ने इसे कठोर और अन्यायपूर्ण बताते हुए कहा कि इस प्रविधान का सहारा लेकर किसी भी मुख्यमंत्री पर केस दर्ज किया जा सकता है, चाहे दोष सिद्ध हो या नहीं। यह संविधान की भावना के विरुद्ध होगा। विधेयकों के विरोध में तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक्स पर लिखा कि यह संघवाद और लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। उन्होंने इसे सुपर आपातकाल से भी ज्यादा घातक बताया और कहा कि सत्ता पक्ष का यह कदम एक व्यक्ति, एक दल एवं एक सरकार को सशक्त बनाने का षड्यंत्र है।
कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने सरकार की नीयत पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसे विपक्ष को दबाने के हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाएगा। आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआइएम) के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि सरकार देश को पुलिस राज्य में बदलने के लिए संविधान में संशोधन कर रही है। कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने भी विधेयक को संविधान के मूल ढांचे पर सीधा आघात करार दिया।उन्होंने कहा कि यह प्रविधान प्रधानमंत्री को सुपर बॉस बना देगा। जांच अधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर ही पदच्युत किया जाना न्यायशास्त्र के सिद्धांतों के विरुद्ध होगा, क्योंकि जब तक दोष सिद्ध न हो, किसी भी जनप्रतिनिधि को हटाना कानून के मूलभूत सिद्धांतों से खिलवाड़ है।