
कोरबा। फाल्गुन माह की देर शामें जब गाँव शहर की गलियों में नगाड़े की गडग़ड़ाहट गूँजती तो फाग गीतों की लहरें सबके दिल धडक़न बन जातीं। बसन्त पंचमी से ही ध्वनि समुद्र में डुबकी लगाते लोक गीतकार, फाग गायक और श्रोताओं की टोली झूमते हुए गीत गाते थे, पर आज कल इस मौसमी मह$िफल में केवल होली का आगाज़ होता है जबकि नगाड़े की जगह इलेक्ट्रॉनिक बीट्स और डीजे मिक्स़ की आवाज़ें भर रही हैं।
नगाड़ा निर्माताओं के बीच इस परिवर्तन को महसूस करने वाले कैलाश रविदास ने बताया की पहले हम साल भर 100 से अधिक नगाड़े बनाते थे हर बार बसन्त पंचमी आते ही नगाड़ा खरीदने वालो की लाइन लगी होती थी। आज कल लोग इस परम्परा को नहीं समझते इसलिए हम केवल 20-30 नगाड़े ही तैयार कर पाए हैं और वह भी अब तक बिके नहीं हैं। कैलाश ने बताया कि सीमित आपूर्ति के कारण इस वर्ष नगाड़े की कीमत में चार गुना इज़ा$फा हो गया है। पहले एक जोड़ी नगाड़े की कीमत लगभग 500 से 700रुपये तक होती थी, अब वही जोड़ी 2500 रुपये तक पहुँच गई है। यह सिर्फ कीमत नहीं, बल्कि परम्परा का मूल्य है जो धीरे धीरे बाज़ार में अपना स्थान खो रहा है।






















