
नई दिल्ली। ओबीसी क्रीमीलेयर का दर्जा तय किए जाने के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि ओबीसी क्रीमीलेयर का दर्जा केवल उम्मीदवार के माता-पिता के वेतन से होने वाली आय के आधार पर तय नहीं हो सकता।
उम्मीदवार के माता-पिता की स्थिति और पद की श्रेणी दोनों महत्वपूर्ण हैं। उनके स्टेटस और सेवा श्रेणी पर विचार किए बिना केवल उनकी आय के आधार पर ओबीसी आरक्षण के लिए क्रीमी लेयर का दर्जा निर्धारित नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत ने गुरुवार को दिए फैसले में कहा कि 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम (कार्यालय ज्ञापन) में दिए गए पदों की श्रेणियों और स्टेटस के मापदंडों के संदर्भ के बगैर केवल उम्मीदवार के माता-पिता की आय के आधार पर क्रीमी लेयर का दर्जा तय करना कानूनन गलत है।
इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि ओबीसी आरक्षण की पात्रता का निर्धारण करते समय निजी कंपनियों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) के कर्मचारियों के बच्चों और सरकारी कर्मचारियों के बच्चों को अलग मानना भेदभावपूर्ण है।
ओबीसी क्रीमीलेयर तय करने के बारे में यह महत्वपूर्ण फैसला जस्टिस पीएस नरसिम्हा और आर. महादेवन की पीठ ने मद्रास और दिल्ली हाई कोर्ट व अन्य के फैसलों को चुनौती देने वाली केंद्र सरकार की अपीलें खारिज करते हुए सुनाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि उसे हाई कोर्ट के फैसलों में कोई खामी नजर नहीं आती। इस फैसले से सिविल सेवा परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले ओबीसी श्रेणी के उन उम्मीदवारों को राहत मिली है, जिन्हें क्रीमी लेयर श्रेणी का बताते हुए ओबीसी के आरक्षण लाभ से वंचित कर दिया गया था।
हाई कोर्ट ने उन उम्मीदवारों का यह दावा स्वीकार कर लिया था कि पीएसयू, बैंक या निजी कंपनियों में काम करने वाले उनके माता-पिता की आय को आधार बनाते हुए उन्हें गलत तरीके से क्रीमी लेयर का मानकर आरक्षण के लाभ से वंचित किया गया है। केंद्र सरकार ने हाई कोर्ट के फैसलों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।





























