
भुवनेश्वर/लखनऊ: देश में खेल और खिलाड़ियों के प्रोत्साहन के बड़े-बड़े दावों की पोल एक वायरल वीडियो ने खोल कर रख दी है। ओडिशा से उत्तर प्रदेश में आयोजित ‘राष्ट्रीय स्कूल कुश्ती चैंपियनशिप’ में हिस्सा लेने जा रहे 18 नन्हे पहलवानों को जिस नारकीय स्थिति का सामना करना पड़ा, उसने खेल प्रशासन की संवेदनहीनता को उजागर कर दिया है।
शर्मनाक: ठंड में ठिठुरते बच्चे, शौचालय के पास बसेरा
सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो ने पूरे देश को झकझोर दिया है। इस वीडियो में 10 लड़के और 8 लड़कियां ट्रेन के शौचालय के पास फर्श पर बैठकर सफर करते नजर आ रहे हैं। कड़ाके की ठंड के बीच ये बच्चे कंबल और शॉल में लिपटे खुद को बचाने की जद्दोजहद कर रहे थे। ये खिलाड़ी कोई आम यात्री नहीं, बल्कि ओडिशा का प्रतिनिधित्व करने वाले राज्य स्तरीय विजेता हैं, जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा दिखानी थी।
विभाग की लापरवाही: न रिजर्वेशन, न कोई सुरक्षा
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन खिलाड़ियों को ओडिशा के ‘स्कूल एवं जन शिक्षा विभाग’ द्वारा प्रतियोगिता के लिए भेजा गया था। हैरानी की बात यह है कि राष्ट्रीय स्तर की यात्रा के बावजूद विभाग ने इनके लिए कन्फर्म टिकट तो दूर, रिजर्वेशन तक की व्यवस्था नहीं की।
सुरक्षा पर बड़े सवाल
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अकेले छोड़े गए बच्चे: यात्रा के दौरान नाबालिग खिलाड़ियों के साथ न तो किसी शिक्षक को भेजा गया और न ही अभिभावकों को अनुमति दी गई।
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वापसी भी रही कष्टदायी: बताया जा रहा है कि पदक की जंग लड़कर लौटते समय भी इन बच्चों को इसी तरह की दुश्वारियों से गुजरना पड़ा।
“जब खिलाड़ी मेडल जीतकर आते हैं, तो फोटो खिंचवाने की होड़ मच जाती है। लेकिन जब उन्हें बुनियादी सुविधाओं की जरूरत होती है, तो सिस्टम उन्हें शौचालय के पास फर्श पर छोड़ देता है। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।” — एक आक्रोशित खेल प्रशंसक (सोशल मीडिया से)
चुप्पी साधे बैठा विभाग
इतना बड़ा विवाद होने और वीडियो वायरल होने के बावजूद ‘स्कूल एवं जन शिक्षा विभाग’ की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण या खेद प्रकट नहीं किया गया है। विभाग की यह चुप्पी उसकी कार्यप्रणाली पर और भी गंभीर सवाल खड़े करती है।
निष्कर्ष
यह घटना महज एक यात्रा का संकट नहीं है, बल्कि उस मानसिकता का परिचायक है जो खिलाड़ियों को सिर्फ ‘वोट बैंक’ या ‘प्रचार का माध्यम’ समझती है। अगर जमीनी स्तर पर खिलाड़ियों का मनोबल इसी तरह तोड़ा गया, तो विश्व पटल पर भारत के खेल महाशक्ति बनने का सपना केवल कागजों तक ही सीमित रह जाएगा।






















