तैमोर पिंगला अभ्यारण्य की रौनक बढ़ाई बाघों ने

वैज्ञानिकों के अनुसार इस विशाल ब्रह्मांड के कन्या सुपर क्लस्टर में हमारी पृथ्वी स्थित है। इसके मिल्की वे आकाशगंगा के अरबों तारों में से एक तारा हमारा सूर्य है। इस सूर्य के गुरुत्वाकर्षण में बंधे कई ग्रहों के बीच लगभग 15 करोड़ किलोमीटर दूरी पर हमारी पृथ्वी स्थित है। सूर्य से यह दूरी एवं तापमान जीवन के अनुरूप होने के कारण यहां जीवन संभव हो पाया जो सभी जीव जंतुओं के साथ-साथ पृथ्वी पर पैदा होने वाले पेड़ पौधों को जीवित रहने एवं बढऩे की शक्ति प्रदान करता है। इसलिए भारतीय अध्यात्म पृथ्वी पर सभी को समान अधिकार के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है।
सहजीवन के अस्तित्व को स्वीकारते हुए आज विश्व के सभी देश समस्त जीव जंतुओं को बचाने का प्रयास कर रहे हैं। विश्व में लुप्तप्राय प्रजाति के जीव को भी बचाने का प्रयास किया जा रहा है। दुनिया के अलग-अलग हिस्से में पाए जाने वाले जीव जंतुओं के संरक्षण की जिम्मेदारी उस हिस्से में बसे देश की होती है। इसी का अनुसरण करते हुए दक्षिण एशिया के क्षेत्र में पाए जाने वाले जीवन में बाघ को बचाने का प्रयास भारत एक लंबे समय से कर रहा है। यही कारण है कि वर्ष 1972 में वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत भारत सरकार द्वारा राज्यों को इन वन्य प्राणियों के संरक्षण हेतु अधिसूचित करने का अधिकार दिया गया। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण की सलाह पर यह अधिसूचना जारी की जाती है। अब तक अन्य जीव जंतुओं के साथ भाग के संरक्षण हेतु कई राज्यों में उनके आवास संरक्षण तथा वृद्धि के लिए संरक्षित क्षेत्र घोषित किए गए हैं जिसमें आंध्र प्रदेश के नागार्जुन सागर श्रीशैलम असम का मानस टाइगर रिजर्व बड़े बाघ अभ्यारण है। छत्तीसगढ़ में बाघों के आवास के लिए पहले से तीन अभयारण्य बीजापुर जिले के इंद्रावती, गरियाबंद का उदंती सीता नदी और पेंड्रा गौरेला मरवाही जिले का अचानकमार बाघ अभयारण्य संचालित थे किंतु बाघों की बढ़ती संख्या एवं अन्य अभयारण्यों से जुड़ाव के कारण छत्तीसगढ़ में वर्ष 2024 में गुरु घासीदास तैमोर पिंगला बाघ अभयारण्य की घोषणा की गई जो अपनी विस्तृत सीमाओं के कारण भारतवर्ष का तीसरा सबसे बड़ा बाघ अभयारण्य कहलाया।
मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़ के विभाजन के बाद जैव विविधता से समृद्ध तीन बा अभ्यारण अस्तित्व में थे लेकिन मध्य प्रदेश के संजय दुबरी और बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व तथा झारखंड के पलामू रिजर्व जैसे पड़ोसी राज्यों के बाघों के आवागमन को ध्यान में रखते हुए पुराने गुरु घासीदास अभ्यारण एवं तैमूर पिंगला अभयारण्य को जोडक़र एक नए गलियारे को बाघों के आवागमन के लिए खोल दिया गया। केंद्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने अक्टूबर 2021 में अधिसूचना को स्वीकृति प्रदान की, जिसे बाद में 18 नवंबर 2024 को विधिवत 56 वें बाघ अभ्यारण क्षेत्र घोषित किया गया । छत्तीसगढ़ के मनेन्द्रगढ़ -चिरमिरी -भरतपुर जिले से शुरू होकर यह अभयारण्य कोरिया , सूरजपुर, एवं बलरामपुर जिले तक फैला हुआ है जिसमें कुल 2050 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र बाघों का मुख्य आवास एवं 780 वर्ग किलोमीटर सुरक्षित बफर क्षेत्र घोषित किया गया है। सुरक्षित बफर क्षेत्र बाघों के आवागमन का वह स्थान होता है जहां बाघ अपने विचरण के लिए आ सकते हैं। यह अभयारण्य अपने पास के राज्यों में स्थित मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ बाघ अभ्यारण एवं झारखंड के पलामू बाघ अभ्यारण से जुड़े होने के कारण बाघों के विचरण के लिए लगभग 4500 वर्ग किलोमीटर का विस्तृत गलियारा तैयार करता है। इसी चुनाव के कारण यह अभयारण्य अब देश के महत्वपूर्ण बाघ अभ्यारण में शामिल है।
गुरु घासीदास- तैमोर पिंगला बाघ अभयारण्य पहले कोरिया जिले से प्रारंभ होता था लेकिन कोरिया जिले के विभाजन के बाद जनकपुर ,कमर्जी एवं कोटाडोल रेंज मनेन्द्रगढ़- चिरमिरी- भरतपुर नए जिले में शामिल हो गया। अपनी जैव विविधता के लिए पूरे देश में चर्चित इस क्षेत्र में 753 प्रजातियां पाई जाती हैं जिसमें 230 पक्षी एवं 55 स्तनपाई वन्य जीव की प्रजातियां शामिल है। 2005 के सर्वेक्षण गणना में यहां 04 बाघ, 45 तेंदुआ, 14 गौर ,110 चीतल, 250 कोटरी, 510 नीलगाय, लगभग 5000 लाल मुंह के बंदर, 1260 जंगली सूअर, 1250 शाही, 3000 काले मुंह के बंदर तथा कहीं-कहीं पैंगोलिन और नेवला के भी मिलने की जानकारी मिलती है। विगत 20 वर्षों में वन्य प्राणियों की संख्या में काफी परिवर्तन हुए हैं इसके अतिरिक्त हिरण। बिल्ली, बड़ी गिलहरी, सांभर, चौसिंघा, चिकारा, लोमड़ी, सियार, नेवला, लकड़बग्घा, खरगोश की बहुतायत संख्या का आवास यह अभ्यारण रहा है। इसमें से कुछ की संख्या में वृद्धि हुई है वहीं वन्य जीवों की संख्या भोजन तथा आवास की कमी के साथ-साथ हिंसक जानवरों के साथ साथ मानव और पशु के द्वंद्व की घटनाओं के कारण इनकी संख्या प्रभावित होती रही है।
पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार वर्ष 2022 में देश में बाघों की संख्या से 10 से 15′ वृद्धि की संभावना है उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2022 तक 3682 भागों की संख्या थी जो 2027 में अंतिम रिपोर्ट आने के बाद आगे इनकी बढ़ोतरी की स्थिति स्पष्ट हो पाएगी। बाघों के शिकार के लिए पर्याप्त संख्या में पशु नहीं होना भी बाघों के संरक्षण की चिंता में शामिल हो रहा है इसलिए कई अभ्यारण क्षेत्र में शिकार के अनुरूप हिरण, कोटरी, गौर, नीलगाय, जंगली सूअर , इस क्षेत्र में लाकर संरक्षित करने और उनके विकास के लिए कार्य किए जाने की योजना की जानकारी इस बाग अभ्यारण के अधिकारियों से प्राप्त हुई है । बाघों के संरक्षण के लिए सुप्रीम कोर्ट ने भी कुछ गाइडलाइन जारी किए हैं जिसमें बाघों के निवास के कोर जोन में पर्यटकों की सफारी चलने पर प्रतिबंध शामिल है। यह निर्णय पर्यटकों और बाघ अभ्यारण को प्रभावित कर सकता है लेकिन बफर जोन में यदि इसे संचालित किया जाए तब पर्यटक भी इसका आनंद ले पाएंगे और बाघों के संरक्षण भी प्रभावित नहीं होंगे।
कोरिया जिले में इस बाघ अभ्यारण्य की भौगोलिक सीमा उत्तर में आनंदपुर से दक्षिण मे मेंड्रा ग्राम तक तथा पूर्व में जोगिया (सुखतरा) से पश्चिम में गरनई (चंदहा) ग्राम तक इसके 1440 वर्ग किलोमीटर भूभाग में फैला हुआ है। मनेन्द्रगढ़ -चिरमिरी- भरतपुर जिले के जनकपुर के चूल गांव से प्रारंभ होकर सूरजपुर जिले के सीमा में मोहली गांव तक यह विस्तार पाता है। गुरु घासीदास – तैमोर पिंगला अभ्यारण के उप संचालक एस बी द्विवेदी एवं संचालक सौरभ सिंह ठाकुर से चर्चा में जानकारी मिली कि इस अभ्यारण में प्रवेश करने के लिए तीन मुख्य द्वार अधिकृत किए गए हैं जिसमें जनकपुर कोटा डोल मार्ग पर खिरकी ग्राम में, बैकुंठपुर सोनहत के मेंड्रा ग्राम में एवं बिहार पुर की ओर से मकरद्वारी प्रवेश द्वार खोले गए हैं, जहां पर्यटकों के अतिरिक्त अभ्यारण की सीमा से बाहर रहने वाले स्थानीय निवासी भी आना-जाना करते हैं।
कोरिया एवं मने-चिर-भरतपूर जिले के क्षेत्र में जनकपुर से सोनहत तक विचरण करते बाघों में मास्टर टावर के पास आमापानी एवं भादा टावर के पास ज्यादातर बाघ देखे गए हैं। विगत दिनों मादा बाघिन द्वारा दो शासको को जन्म देने का स्थान भी यही क्षेत्र था। वर्तमान में कोटाडोल , कमर्जी एवं जनकपुर रेंज मने-चिर-भरतपूर जिले में आता है । सुरक्षा एवं संरक्षण के लिए किए जाने वाले उपायों की चर्चा में जानकारी मिली कि प्रवेश द्वार पर चार पहिया एवं दो पहिया वाहनों की संपूर्ण जानकारी पंजीबद्ध की जाती है। इसका उद्देश्य आप जहां जा रहे हो उसकी संपूर्ण जानकारी वन विभाग को होना आवश्यक है। निर्धारित स्थल से इधर-उधर जाने को प्रतिबंधित किया जाता है। आपकी गाड़ी की गति 30 किलोमीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए ताकि रास्ते में विचरण करते वन्य जीव प्रभावित न हो। इसी तरह किसी भी आग्नेय अस्त्रों को इस क्षेत्र में ले जाना प्रतिबंधित है। अपने पर्यटन के दौरान वन क्षेत्र में कहीं भी आगे बढऩे से पहले वन विभाग से जानकारी जरूर ले लें। जानकारी में पता चला कि अलग-अलग क्षेत्र में वन्य जीव अलग-अलग पाए जाते हैं जनकपुर क्षेत्र में नीलगाय, तेंदुआ, खरगोश, चीतल,जंगली मुर्गा, जैसे वन्य जीव मिलते है जबकि सोनहत के जंगलों में जंगली सूअर गौर, कोटरी, भारतीय गिद्ध, शाही, जंगली मुर्गा, सियार, काले और लाल मुंह के बंदर पाए जाते हैं।
भविष्य में पर्यटन को बढ़ावा देने की जानकारी लेने पर बताया गया कि यहां पर बफर जोन में पर्यटकों के लिए अभयारण्य में वन विभाग द्वारा गाडिय़ां चलाने पर विचार किया जा रहा है, जिसमें इस अभ्यारण की जैव विविधता, वनस्पतियों, नदियों, पर्वतमालाओं और वन्य जीव की जानकारी शामिल होगी। इसी तरह सोनहत के जंगलों में हिरण, कोटरी एवं नीलगाय की प्रजाति को लाकर संरक्षित किए जाने की योजना भी विचाराधीन है। जो इस अभ्यारण के उज्जवल विकसित भविष्य का संकेत देती है। अब तक आने वाले पर्यटकों की संख्या पर उन्होंने बताया हिमालय क्षेत्र मैं ट्रैकिंग करने वाली ’ इंडिया हाईक ‘कंपनी के द्वारा इस क्षेत्र को ट्रेकिंग के लिए चयनित किया गया है जो अपनी टीम लेकर विगत 07 साल से यहां आ रही है। इनका टूर 8 से 10 दोनों का होता है जिसमें 10 किलोमीटर की यात्रा और पहाडिय़ों की चढ़ाई शामिल होती है। अब तक लगभग 150 पर्यटक ट्रैकिंग के लिए आ चुके है। उन्होंने बताया कि ट्रैकिंग का उद्देश्य नई पीढ़ी को जैव विविधताओं एवं वाइल्ड लाइफ से परिचित कराना होता है क्योंकि यही पीढ़ी आगे चलकर वन संरक्षण एवं जैव विविधता को आगे बढ़ाने में सहयोगी सिद्ध होगी। पर्यटकों की संख्या के संदर्भ में पर्यटकों की संख्या के संदर्भ में उन्होंने बताया कि लगभग चार से 5000 पर्यटक प्रति वर्ष यहां पहुंचते हैं लेकिन इसमें वह ग्रामवासी भी शामिल होते हैं जो अभ्यारण के उस पार बसे दूसरे गांव जाने के लिए आते हैं।
गुरु घासीदास- तैमोरपिंगला अभ्यारण जहां बाघों का नया आवास बन गया है वही बाघों की बढ़ती जनसंख्या के कारण उनके आवास अभी भी कम पड़ रहे हैं। क्योंकि एक मादा बाघ को जहां 200 से लेकर 1000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र की आवश्यकता होती है वही एक नर भाग को अपने शिकार एवं छिपने के लिए इससे दुगुने से लेकर 15 गुना स्थान की जरूरत होती है, ताकि उन्हें उनका भोजन और आवास की स्वतंत्रता मिल सके। इस बाघ अभ्यारण में बाघ संरक्षण के साथ-साथ जैव विविधता के विभिन्न कारक नदी पहाड़ एवं सघन वनों की उपस्थिति इसे पर्यटकों के लिए विशिष्ट आकर्षक बनाती है।

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