
टीस और दर्द के बीच गुजरते जीवन में खुशी दी अनजानों ने
कोरबा। कर्मफल चाहे जो भी हो, लेकिन जीवन में भाग्य की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। कई बार परिस्थितियाँ इंसान को वहाँ पहुँचा देती हैं, जहाँ जाने का उसने कभी सोचा तक नहीं होता। कोरबा के इकलौते वृद्ध आश्रम में रह रहे बुजुर्गों की हालत देखकर यही महसूस होता है। इनके चेहरे पर कहीं पछतावा झलकता है, कहीं अपने ही भाग्य पर गहरा दुख।इनमें से कुछ बुजुर्ग शहर से हैं, तो कुछ ग्रामीण इलाकों से आए हैं। महिलाएँ भी हैं और पुरुष भी—सभी अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुँचकर यहाँ ठहर गए हैं। किसी ने अपनी मर्जी से घर छोड़ा, तो किसी को परिवार वालों ने घर से बाहर कर दिया। अब इनके पास बची हैं तो सिर्फ पुरानी यादें, दर्द और तन्हाई… मगर इन सबसे लड़ते हुए ये लोग यहाँ सामूहिक रूप से जीवन के बचे हुए दिनों को गुज़ारने के लिए तैयार हैं। करीब डेढ़ दशक से अधिक समय से यहाँ रह रहे कई बुजुर्ग बताते हैं कि उन्हें अपनों से जितना प्यार नहीं मिला, उससे कहीं अधिक स्नेह उन्हें अनजान लोगों से मिला है। समय-समय पर कोरबा जिले के सामाजिक संगठन, छात्र, व्यापारी और आम लोग यहाँ आकर इनसे मिलते हैं, बात करते हैं और मदद के लिए हाथ बढ़ाते हैं। इसके विपरीत कई बुजुर्गों ने बताया कि उनके परिजन वर्षों से उनसे मिलने तक नहीं आए।वृद्ध आश्रम की अवधारणा भले ही पश्चिमी देशों से आई हो, लेकिन कोरबा में यह मजबूरी से जन्मी व्यवस्था अब कई बुजुर्गों के लिए सहारा बन गई है। यहाँ रहने वाले लोग कहते हैं कि अब यही उनका घर है—यही उनका परिवार। उनका दुख यह भी है कि रिश्तों की दुनिया ‘मतलबी’ होती चली गई, लेकिन राहत इस बात की है कि बिना किसी रिश्ते-नाते के भी बहुत से लोग आज भी अच्छे हैं, जो उनकी मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। इन बुजुर्गों की कहानी हमें यह भी सिखाती है कि समाज में भले ही स्वार्थ बढ़ रहा हो, पर इंसानियत अभी भी जिंदा है। और शायद इसी उम्मीद पर ये लोग अपने बचे हुए जीवन का सहारा ढूंढते हुए हर नए दिन का इंतज़ार करते हैं।
















