
कोरबा। अपना घर, अपने लोग, अपना सब कुछ लेकिन फिर भी ठिकाना कहि और। यह किसी फिल्म की पटकथा का हिस्सा नही बल्कि वास्तविक जीवन मे घटित व्यथा है, जो कही और नही बल्कि कोरबा में लोगों को बता रही है कि कुछ महिलाओं की जिंदगी आखिर कठिन क्यों हो गई। खुद के घर से निकाली गई इन महिलाओं को कोरबा में आश्रय दिया अपना घर ने। जानिए क्या है इनकी दर्द भरी कहानी।
मदर डी पर महिलाओं से संबंधित सफलता उपलब्धियां और समस्याओं को जानने के लिए ग्रैंड न्यूज़ ने कोशिश की। इसी दौरान छत्तीसगढ़ हेल्थ वेलफेयर सोसाइटी के द्वारा संचालित अपना घर सेवा आश्रम का ध्यान आया तो टीम वहां जा पहुंची। मालूम चला कि यहां तो जिंदगियां जरूर है लेकिन काफी परेशान, जिनके बारे में किसी शायर ने लिखा था – ऐ जिंदगी आ बैठ कहीं चाय पीते हैं., तू भी थक गई होगी मुझे भगाते भगाते ।यहां पर हमारी मुलाकात हुई पिंकी साहू से जो मूल रूप से उड़ीसा की रहने वाली है और पिछले 4 वर्ष से यहां रह रहे हैं। उनके घर में माता-पिता है और ससुराल में सभी परिजन। ससुराल के लोगों ने उन्हें परेशान किया और आखिरकार भगा दिया । उनके सामने अब यही विकल्प बचा हुआ है। जांजगीर चांपा जिले के कोर्ट में सोनार गांव की रहने वाली गिरिजा सोनी की कहानी कुछ अलग है। सबसे विशेष बात यह है कि उनके तीन बेटे हैं और सभी अच्छे खासे हैं। उनसे गिरिजा को कोई खास शिकायत नहीं है लेकिन जो बताती है कि उनके संधि ने ही उन्हें यहां छोड़ दिया है। उनके प्रभाव में आकर बच्चे जरूर यहां आते हैं लेकिन वह भी अब कहते हैं कि सब कुछ माया मोह है इसलिए यहां रहो।गिरिजा सोनी, निर्वासित कोरबा जिले के तिलकेजा की निवासी महिला भी यहां लंबे समय से रह रही है। गांव से यहां आने को लेकर भी उसने पूरी दास्तान बताई। अपना घर सेवा आश्रम की केयरटेकर शांति अग्रवाल बताती है कि यहां पर अलग-अलग श्रेणी के लोगों को रखा गया है जिनका कोई नहीं है। दृष्टिकोण से इन तीन महिलाओं के मामले बिल्कुल अलग हैं। संबंधित परिजन इनके बारे में क्यों नहीं सोच रहे हैं या चिंता का विषय है। विभिन्न मामलों को लेकर सरकार और उसका तंत्र लोगों के सामाजिक पुनर्वास की दिशा में काम कर रहा है। काफी संख्या में ऐसे मामलों को सुलझाने की कोशिश भी की गई है। सब कुछ होने के बावजूद महिलाओं को दूसरों पर निर्भर रहना पड़े यह अपने आप में दुर्भाग्यपूर्ण है।


















