
धर्मशाला, २० जून ।
कई कूटनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि विश्व का अगला फ्लैश प्वाइंट (वैश्विक तनाव का केंद्र) तिब्बत हो सकता है। बुधवार (19 जून) को इसका एक अहम संकेत धर्मशाला से मिला, जहां पहली बार अमेरिकी सांसदों के एक बड़े दल ने तिब्बत से निर्वासित धर्मगुरु दलाई लामा से मुलाकात की। एक दिन पहले ही चीन ने इस मुलाकात की बेहद कड़े शब्दों में निंदा की थी और अमेरिका को दलाई लामा से अलग रहने को कहा था।इसके बावजूद अमेरिका के सत्ता व विपक्ष के सात प्रमुख सांसदों ने न सिर्फ दलाई लामा से मुलाकात की, बल्कि आजाद तिब्बत की बात भी कही। अमेरिकी सांसदों के प्रतिनिधि (विदेशी मामलों के अध्यक्ष) माइकल मैकोल ने यहां तिब्बत को लेकर अमेरिकी नीति में बदलाव की बात कही और हाल ही में अमेरिकी संसद में पारित रिजाल्व तिब्बत एक्ट की कापी भी पेश की।भारत ने अमेरिकी सांसदों की दलाई लामा से मुलाकात पर कोई टिप्पणी नहीं की है, लेकिन उसकी नजर इस पूरे घटनाक्रम पर है।
वैसे भी अमेरिकी सांसदों के इस दल को धर्मशाला आने की मंजूरी औपचारिक तौर पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने ही दी है। मैकोल, अमेरिकी संसद की पूर्व अध्यक्ष नैंसी पेलोसी, भारतीय मूल के सांसद अमी बेरा वाले इस दल ने बुधवार विदेश मंत्री एस जयशंकर से मुलाकात की है।बताया जा रहा है कि इसमें द्विपक्षीय संबंधों के साथ ही तिब्बती शरणार्थियों को लेकर भी बातचीत हुई है।
भारत और अमेरिका दोनों दुनिया के दूसरे अन्य देशों की तरह आधिकारिक तौर पर ‘एक चीन’ नीति को मानते हैं। चीन इसके आधार पर दोनों देशों को बार-बार तिब्बत के मामले में आगाह करता रहा है। ऐसे में अमेरिकी संसद में तिब्बत को लेकर पारित विधेयक और उसके सांसदों के धर्मशाला आकर दलाई लामा से मुलाकात करने को अमेरिकी नीति में बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है।अमेरिकी रुख को सांसद मैकोल ने इस तरह से रखा, यहां आने से पहले हमें चीन की तरफ से एक चेतावनी पत्र मिला था, जिस पर उसने तिब्बत पर अपने झूठे कब्जे की बात दोहराई है। लेकिन हम चीन को डराने का अधिकार नहीं दे सकते। इसलिए उसकी चेतावनी को नजरअंदाज कर हम यहां आए हैं। हम सब जानते हैं कि तिब्बत कभी चीन का हिस्सा नहीं रहा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि अमेरिकी संसद में पारित विधेयक पर शीघ्र राष्ट्रपति जो बाइडन हस्ताक्षर करेंगे, जिससे तिब्बत को लेकर चीन के दुष्प्रचार को खत्म किया जा सकेगा।

































