
शीत ऋतु आते ही बैकुंठपुर पहुंचने लगे प्रवासी पक्षी
कोरिया बैकुंठपुर। शीत ऋतु के आगमन होते ही प्रवासी पक्षी भी क्षेत्र में पहुंचने लगे हैं। जिले में शनिवार के दिन उत्तर पश्चिम क्षेत्र में पाए जाने वाला खंजन पक्षी देखा गया है। जिला मुख्यालय बैकुंठपुर से करीब 4 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम साल का के अभिनय पाण्डेय ने सवेरे खिड़की पर एक पक्षी को बैठे देखा इस दौरान इसकी तस्वीर खींची। अभिनय ने बताया, उन्हें पेड़ पौधों और पक्षियों के बारे में पढऩा और जानना पसंद है। पंछी के बारे में अध्ययन किया तो पता चला, यह वन खंजन है। इसका धार्मिक महत्व रामायण में बताया गया है। पक्षियों की प्रजाति के बारे में अच्छी जानकारी रखने वाले सुरेंद्र ने भी वन खंजन की पुष्टि की है। यह पक्षी वन क्षेत्र में पाए जाते हैं। पूर्वी एशिया के इलाकों में प्रजनन करते हैं और भारत से लेकर इंडोनेशिया तक सर्दियों में यात्रा करते हैं। इसकी विशिष्ट संरचना इसे अन्य वैगटेल्स से अलग करती है। सभी वैगटेल अपनी पूंछ उपर-नीचे हिलाते हैं, जबकि ये अपनी पूंछ दाएं-बाएं हिलाते हैं। ये छोटे किट खाती हैं। इसकी पीठ सिलेटी भूरे रंग की होती है। इस पर हल्की जामुनी और पीले रंग की आभा होती है। खंजन भारतीय साहित्य का एक चिर परिचित पक्षी है। इसे खिंडरीच खंजारिथ, खंडलिच, पिनाकी, खैरा, धोबन, बाल कटारा, बालीभाती, तिपोषी जैसे कई नाम से और अंग्रेजी में इसे ग्रे वेग टेल के नाम से जाना जाता है। यह पक्षी शीत ऋतु में उत्तर पश्चिमी इलाके से प्रवास करके देश के अलग-अलग हिस्सों में फैल जाते है। जैसे ही गर्मी का मौसम शुरू होता है वैसे ही यह ठंडे प्रदेशों की ओर वापस लौट जाता है। हालांकि यह बहुत चपल और चंचल पक्षी है। यही कारण है कि भारतीय कवियों व साहित्यकारों ने अपने साहित्य में इसका बखूबी वर्णन किया है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी श्री रामचरितमानस में इस पक्षी का उल्लेख किया है। किष्किंधा कांड में गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं की रस रस सूख सरित सर पानी। ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी जानि सरद रितु खंजन आए। पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए श्री रामचरितमानस में इस पक्षी का एक और जगह उल्लेख किया गया है। खंजन मंजु तिरीछे नयननि चौपाई में बताया गया है कि। रामचरित मानस में वनवास के समय जब महिलाएं सीता जी से पूछती हैं कि साथ के दो सुंदर सशक्त युवकों में उनके पति कौन हैं? तब सीताजी रामचंद्रजी का नाम न लेकर हाथ से इशारा कर कहती हैं, खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निज पति कहेउ तिन्हहिं सिय सैननि। अपने खंजन के समान सुंदर नयनों से रामचंद्र जी की तरफ तिरछे देखते हुए कहती हैं, यही मेरे पति हैं। भले ही इस पक्षी का जीवनकाल 7 से 8 वर्ष का हो पर श्री रामचरितमानस जैसे महाकाव्य में स्थान मिलने के बाद यह पक्षी विश्व विख्यात हो गया है। जानकारी के अनुसार हिमालय पर रहने वाले ऋषियों ने इसे खंजन का नामा दिया है। इसे ग्रे-वैगटेल या ग्रे-खंजन के नाम से भी जाना जाता है, जो अपनी लंबी दुम, सलेटी-पीठ, तथा पीले पेट के कारण आसानी पहचाना जा सकता है। हिमालयी खंजन उत्तर भारत के क्षेत्रों के साथ मुंबई व दक्षिणी पठार के अनेक क्षेत्रों तक पहुंच जाता है। खास है कि इसकी याददाश्त इतनी तीव्र होती है, यह जहां पहले प्रवास करता है। अगले पड़ाव पर शीत प्रवास उसके ही चुनता है।













