
आर्टिफिशियल दीयों के कारण कुछ मुश्किलें
कोरबा। दीपावली पर मिट्टी के दीयों की महत्ता आज भी कायम है। धनतेरस से पहले शहर और आसपास में कुम्हारों की दुकानें लगी हुई हैं। धनतेरस से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक मिट्टी के दीयों का उपयोग हिंदू समाज परंपरागत तरीके से करता है। इधर आधुनिकता और बाजारवाद के चक्कर मे कुम्हारों को आॢटफिशियल दीयों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है। दावा किया जा रहा है कि यह सामान चाइनीज जैसा नजर आ रहा है जबकि याद रखना होगा कि सरकार ने चाइनीज सामानों को पहले ही प्रतिबंधित कर रखा है।
लंका विजय के बाद मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीरामचंद्र के अयोध्या पहुंचने पर प्रजा के द्वारा उनका स्वागत सत्कार मिट्टी के दीए जलाकर किया गया था। कार्तिक कृष्ण पक्ष की अमावस्या को यह अवसर था दीपावली का जिसने एक परंपरा सुनिश्चित की और इसका निर्वहन भारतीय समाज तब से लेकर अब तक कर रहा है पूरी निष्ठा के साथ। लघु भारत की पहचान रखने वाले कोरबा जिले के ग्रामीण और शहरी क्षेत्र में मिट्टी पर आधारित व्यवसाय करने वाले कुम्हार दिन-रात काम कर रहे हैं। उनके द्वारा तैयार किए गए मिट्टी के दीए की श्रृंखला बाजारों में पहुंच गई है। कोरबा नगर के बाजार में इनकी बिक्री अभी से शुरू हो गई है । प्रजापति समुदाय से आने वाली महिलाएं बताती है कि दीपावली का त्योहार उनके लिए बेहद खास होता है क्योंकि इस सीजन में हमारे द्वारा बनाए गए दिए और दूसरे सामान बड़ी मात्रा में बिकते हैं । दीपावली पर इनका अपना महत्व होता है।
दीपावली को लेकर प्रजापति समुदाय काफी समय पहले से अपनी तैयारी करता है ताकि त्योहार मनाने वाले समाज को उनकी जरूरत की चीज यानी मिट्टी के दिए पूरी मात्रा में दिए जा सके। बताते हैं कि इस बार मार्केट में चाइनीस एंट्री की एंट्री हुई है जिससे कुछ समस्याएं तो हैं। दिवाली में मुख्य रूप से माता लक्ष्मी के स्वागत के लिए दीप जलाए जाते हैं ताकि अमावस्या की रात के अंधकार में दीपो से वातावरण रौशन हो जाए। दीपावली की रात पहला दीया लक्ष्मी पूजा के दौरान जलाएं। ऐसी मान्यता है कि दिवाली के दिन पितरों और यम के लिए दीपदान करने से जातक को पुण्य फल की प्राप्ति होती है । साथ ही कुल देवी भी प्रसन्न होती है। कुम्हारों को उम्मीद है कि दीपावली पर इस बार लोगों के घर आँगन मिट्टी के दीये से रोशन होंगे और उनके कारोबार को दुर्दिन नहीं देखने पड़ेंगे।
जागरूकता का हुआ असर
कारोबारी बताते हैं कि अलग-अलग प्लेटफार्म पर जागरूकता से जुड़े संदेश आम होने का काफी असर हुआ है। वे महसूस करते हैं कि निम्न और मध्यम वर्गीय लोग पूजा से जुड़ी सामाग्री को लेकर मोलभाव नहीं करते जबकि उच्च वर्गीय लोगों के मामले में पुरानी प्रथा कायम है।






























